आजादी के बाद की Maulana Abul Kalam Azad की वो स्पीच जो हर मुसलमान को ज़रूर सुन्नी चाहिए

By : Arshad  |  Updated On : 10 Aug, 2021

आजादी के बाद की Maulana Abul Kalam Azad की वो स्पीच जो हर मुसलमान को ज़रूर सुन्नी चाहिए

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद या अबुल कलाम मुहियुद्दीन को हर हिन्दुस्तानी बखूबी जनता है. आजादी के दौरान मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस पार्टी के सीनियर लीडर थे. बात करते हैं इनकी स्पीच के बारे में तो आजादी के बाद इन्होनें जामा मस्जिद दिल्ली पर मुसलामानों को लेकर एक स्पीच दी थी, उन्होंने आजादी मिलने पर मुसलामानों को उस वक़्त खिताब दिया था. आज़ाद साहब 11 नवम्बर 1888 को मक्का में पैदा हुए थे. और उन्होंने साल 1958 को इस दुनिया से रुखसती ले ली.

क्या है उनकी स्पीच?

मौलाना अबुल कलाम की वो स्पीच जो आज भी हर हिन्दुस्तानी के दिलों में मौजूद है, “मेरे अजीज़ दोस्तों! आप जानते हैं कि वो कौनसी जंजीर है जो मुझे यहाँ ले आई. मेरे लिए शाहज़हां की इस मस्जिद में ये इज्तिमा नया नहीं. मैंने उस ज़माने में भी किया. अब बहुत सी गर्दिश बीत चुकी है. मैंने जब तुम्हे खिताब किया था. तब तुम्हरे चेहरे पर बेचैनी नहीं इत्मीनान था, तुम्हारे दिलों में शक के बजाये भरोसा था. आज तुम्हरे चेहरों की परेशानियाँ और बेचैनियाँ देखता हूँ तो भूली बिसरी कहानियां याद आ जातीं हैं.”

क्या आपको याद है Maulana Abul Kalam Azad की वो कविता जो आजादी के बाद उन्होंने कही?

तुम्हें याद है? मैंने तुम्हें पुकारा और तुमने मेरी ज़बान काट ली. मैंने कलम उठाया तुमने मेरे हाथ कलम कर दिए. मैंने चलना चाहा तुमने मेरे पाँव काट दिए. मैंने करवट लेनी चाहि तो तुमने मेरी कमर तोड़ दी. हद ये कि पिछले सात साल में तल्ख़ सियासत जो तुम्हें दाग-ए-जुदाई दे दी गयी है. उसके अहद-ए-शबाब में भी मैंने तुम्हें खतरे की हर घड़ी को झिंझोड़ा बल्कि तुमने मेरी गफलत और इनकारी की सारी सुन्नातें ताज़ा कर दीं. आपको बताते चलें मौलानाधारासन सत्याग्रह के अहम इन्कलाबी (क्रांतिकारी) थे. वे साल 1940-45 के बीच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे जिस दौरान भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ था.